नमस्कार दोस्तों लेकर आ गया हूं एक नई कविता जो कि मैंने लिखी है भगवान परशुराम जी के ऊपर मुझे उम्मीद है आपको यह कविता पसंद आएगी आप अपने इस मित्रों में भी जरूर शेयर करें भगवान परशुराम, विष्णु के छठे अवतार, को धर्म, न्याय और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। परशुराम की कथा, उनके अवतार का उद्देश्य, और अन्याय के विरुद्ध उनके पराक्रम को यह कविता समर्पित है। परशुराम, जिन्हें क्षत्रिय कुल संहारक और शस्त्र एवं शास्त्र के ज्ञाता के रूप में जाना जाता है, ने अधर्म के नाश के लिए परशु उठाया। वे चिरंजीवी ऋषि हैं, जो महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं और भविष्य में कल्कि अवतार के गुरु बनेंगे।
परशुराम और कार्तवीर्य अर्जुन की कथा, कर्ण के गुरु परशुराम, और उनके द्वारा किए गए क्षत्रियों के संहार की पौराणिक कहानियां आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने अपने परशु से अन्याय का नाश किया और धर्म की स्थापना की। वे न केवल एक योद्धा बल्कि ब्राह्मण कुल के गौरव भी हैं, जिन्होंने गौ माता की रक्षा और वेदों के ज्ञान को आगे बढ़ाया।
यदि आप भगवान परशुराम की महिमा, उनकी शक्तियां, और उनके जीवन से जुड़ी कथाएं पढ़ना चाहते हैं, तो यह कविता आपको शौर्य, भक्ति और धर्म की गहराई में ले जाएगी। यह परशुराम स्तुति, परशुराम चालीसा, और परशुराम मंत्र की तरह उनकी महिमा का गुणगान करती है।
इस कविता में भगवान परशुराम का ओजस्वी रूप, उनका संहारकारी रूप, और धर्म की रक्षा के लिए उनकी कठोरता को दिखाया गया है। यदि आप हिंदू धर्म, पौराणिक कथाएं, परशुराम जयंती, और परशुराम मंदिरों के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह रचना आपको सही मार्गदर्शन देगी।
भगवान परशुराम कौन थे?
परशुराम का इतिहास और कथाएं
परशुराम के शस्त्र और पराक्रम
परशुराम का संहार और न्याय
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भगवान परशुराम पर सुंदर कविता: “मैं परशुराम हूं”
मैं क्षत्रिय कुल नाशक हूं, मैं जाति से ब्राह्मण हूं,
रेणुका का पुत्र, शिव का शस्त्र, शास्त्र का ज्ञाता हूं।
मैं पाप का संहार हूं, मैं विष्णु का अवतार हूं,
बिन परशु के मैं राम हूं, मैं परशुराम हूं।
मैं मिटाता अन्याय को, मैं पूजता गायों को,
जानता हूं संहार करना, जब राह पाप की पड़ जाए तो।
मैंने कार्तवीर्य को मार दिया, दुर्बुद्धि क्षत्रियों का संहार किया,
जिसने उंगली उठाई न्याय पर, उसे परशु से ही फाड़ दिया।
मैं कर्ण का भी गुरु हूं, मैं ब्राह्मण का गुरूर हूं,
मैं धरा पर अमिट हूं, मैं सृष्टि में अमर हूं।
मैं अपने ही अवतार से भिड़ गया, जब शिवधनुष टूट गया,
मैं युग-युग का वासी हूं, मेरी दृष्टि से कुछ न बच गया।
भविष्य में भी आऊंगा, कल्कि का गुरु बन जाऊंगा,
महेंद्र पर्वत पर बसता हूं, कभी छाया, कभी धूप बन जाऊंगा।
मैं पापों का संहार हूं, मैं सिंह की दहाड़ हूं,
जो झांकी नगरी अन्याय की, उसे परशु से ही फाड़ दूं।
चिरंजीवी हूं इस धरा पर, मैं जमदग्नि की संतान हूं,
मैं परशुराम हूं, मैं परशुराम हूं!
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