यह कविता हिमाचल प्रदेश के लोगों की मजबूती और शांतिपूर्ण स्वभाव को दर्शाती है। यह बताती है कि कैसे हिमाचलवासी स्वभाव से शांत होते हैं, लेकिन अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में सक्षम हैं। इस कविता में गुरुजनों के प्रति सम्मान और सीखने की गहरी भावना को भी व्यक्त किया गया है। साथ ही, यह उन लोगों के लिए एक तीव्र संदेश है जो खालिस्तान के नाम पर समाज को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह कविता याद दिलाती है कि सिख और हिंदू एकता कभी टूट नहीं सकती, क्योंकि उनकी जड़ें सम्मान, विश्वास और संस्कृति में गहराई से बसी हुई हैं। जो लोग खालिस्तान का सपना देख रहे हैं, वे असल में उसी थाली में छेद कर रहे हैं जिसमें वे खा रहे हैं। यह कविता उन लोगों की निंदा करती है जो गुरुओं की असली शिक्षाओं को भुलाकर नफरत फैला रहे हैं। यह संदेश देता है कि सच्चा खालसा वही है जिसका दिल साफ और इरादे नेक होते हैं। हिमाचलियों का शांत स्वभाव उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी ताकत है। यह कविता सिख-हिंदू एकता और भाईचारे का एक बुलंद प्रतीक है।मैं आए दिन कुछ ना कुछ लिखता रहता हूं अगर आप कविताएं शायरियां और कोट पढ़ने के शौकीन है तो जुड़ जाइए http://wordsbykksb.com के साथ।
Himachal Against Khalistan – Poetry
मत समझो कमजोर के हम हिमाचल वाले हैं
शांत है स्वभाव तभी मुँह पर ताले हैं।
सीखों के लिए इज़्ज़त है, गुरुओं के लिए आदर भी,
पर उनके लिए कुछ भी नहीं जो भिंडरावाले हैं।
देश अपने को तोड़कर इन्हें खालिस्तान बनाना है,
यानी उसी थाली में छेद करो जिसमें तुम्हें खाना खाना है।
तुम भूल कुर्बानी क्या, वो गुरुओं की गुरबाणी क्या,
एक ओंकार का मतलब क्या और खालसे की कहानी क्या।
कुछ बातों से प्रेरित होकर हिंदुओं से बैर रखते हो,
यानी जुबान पर तो खालसा है पर दिल में गैर रखते हो।
हिंदू-सिख तो एक हैं, पर कुछ एकता तोड़ने वाले हैं,
मजहब से इनको मतलब नहीं ये हुकूमत चाहने वाले हैं।
हम गुरुद्वारों में नतमस्तक हैं और गुरुओं के लिए इज़्ज़त भी,
पर उनके लिए कुछ भी नहीं जो भिंडरावाले हैं।
Himachal Against Khalistan – Poetry
Mat samjho kamzor ke hum Himachal wale hain,
Shant hai swabhav, tabhi muh par taale hain.
Sikhon ke liye izzat hai, guruon ke liye aadar bhi,
Par unke liye kuch bhi nahin jo Bhindran wale hain.
Desh apne ko todkar, inhe Khalistan banana hai,
Yani ussi thaali mein ched karna, jismein tumhe khana khana hai.
Tum bhool gaye ho kurbani kya, woh guruon ki Gurbani kya,
Ek Omkar ka matlab kya, aur Khalse ki kahani kya.
Kuch baton se prerit hokar, Hinduon se bair rakhte ho,
Yani zubaan par toh Khalsa hai, par dil mein gair rakhte ho.
Hindu-Sikh toh ek hain, par kuch ekta todne wale hain,
Mazhab se inhe matlab nahin, ye hukumat chahne wale hain.
Hum Gurudwaron mein natmastak hain, aur guruon ke liye izzat bhi,
Par unke liye kuch bhi nahin jo Bhindran wale hain.
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